भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में महात्मा गाँधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस, ये दो नाम सबसे प्रमुखता और सम्मान के साथ लिए जाते हैं। पूरा...
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में महात्मा गाँधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस, ये दो नाम सबसे प्रमुखता और सम्मान के साथ लिए जाते हैं। पूरा देश गाँधी जी को 'राष्ट्रपिता' (Father of the Nation) के रूप में पूजता है। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से देश के जनमानस को जगाया। लेकिन जब हम ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने वाले अंतिम और सबसे निर्णायक प्रहार की बात करते हैं, तो यह कहना बिल्कुल सटीक प्रतीत होता है कि यदि गाँधी जी 'फादर ऑफ़ नेशन' हैं, तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस 'फादर ऑफ़ फ्रीडम' (Father of Freedom) हैं।
दो महान नायक, दो अलग मार्ग
गाँधी जी और नेताजी, दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही था—भारत की पूर्ण स्वतंत्रता। लेकिन दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग थे।
गाँधी जी का मार्ग: उनका मानना था कि आज़ादी अहिंसा, असहयोग और सविनय अवज्ञा से मिलनी चाहिए। उन्होंने पूरे देश को एक सूत्र में बांधने और सामाजिक सुधार का काम किया।
नेताजी का मार्ग: सुभाष चंद्र बोस यथार्थवादी (pragmatic) थे। उनका स्पष्ट मानना था कि कोई भी साम्राज्यवादी ताक़त केवल हृदय परिवर्तन या अहिंसक विरोध से सत्ता नहीं छोड़ती। ब्रिटिश साम्राज्य जैसी क्रूर शक्ति को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र संघर्ष और कूटनीति अनिवार्य थी। उनका नारा था— "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा!"
आज़ाद हिन्द फौज (INA) का अकल्पनीय साहस
जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, तब नेताजी ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी कल्पना भी किसी भारतीय नेता ने नहीं की थी। ब्रिटिश जासूसों की आँखों में धूल झोंककर वे भारत से निकले और जर्मनी होते हुए जापान पहुँचे। वहां उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज की कमान संभाली।
यह कोई साधारण घटना नहीं थी। उन्होंने युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों को मिलाकर एक ऐसी फौज खड़ी कर दी, जिसने ब्रिटिश सेना की आँखों में आँखें डालकर युद्ध किया। उन्होंने 'स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार' (Provisional Government of Free India) का गठन किया, जिसे दुनिया के 9 देशों ने मान्यता भी दी थी। नेताजी ने अंडमान और निकोबार द्वीपों को आज़ाद कराकर उनका नाम 'शहीद' और 'स्वराज' द्वीप रखा।
ब्रिटिश साम्राज्य पर अंतिम और निर्णायक प्रहार
अक्सर यह माना जाता है कि 1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन' आज़ादी का अंतिम प्रहार था। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
1945 में जब आज़ाद हिन्द फौज के वीर सैनिकों (शाहनवाज़ खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लन) पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा (Red Fort Trials) चला, तो पूरे देश में एक अभूतपूर्व आक्रोश फैल गया। जो भारतीय सैनिक अब तक ब्रिटिश मुकुट के प्रति वफादार थे, उनके दिलों में राष्ट्रवाद की ज्वाला भड़क उठी।
इसका सीधा परिणाम 1946 के नौसेना विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny) के रूप में सामने आया। बम्बई से लेकर कराची तक, भारतीय नौसैनिकों ने ब्रिटिश झंडे उतार फेंके और आज़ाद हिन्द फौज के समर्थन में नारे लगाए। थल सेना और वायु सेना में भी बगावत की सुगबुगाहट होने लगी।
ऐतिहासिक प्रमाण: ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली (Clement Attlee), जिन्होंने भारत की आज़ादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे, जब 1956 में कलकत्ता आए, तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.बी. चक्रवर्ती ने उनसे पूछा था— "जब 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद सब कुछ शांत हो गया था, तो अंग्रेजों ने 1947 में अचानक भारत क्यों छोड़ दिया?"
एटली का जवाब था— "सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज और भारतीय सेना में हुई बगावत के कारण। अंग्रेजों को समझ आ गया था कि अब वे भारतीय सैनिकों के भरोसे भारत पर राज नहीं कर सकते।" जब चक्रवर्ती ने पूछा कि इसमें गाँधी जी का कितना प्रभाव था, तो एटली ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा— "Minimal" (न्यूनतम)।
निष्कर्ष: 'फादर ऑफ़ फ्रीडम' क्यों?
गाँधी जी ने निस्संदेह भारत की जनता को निडर बनाया और उन्हें राजनीतिक रूप से जागरूक किया। एक 'राष्ट्र' के रूप में भारत को गढ़ने में उनका योगदान अतुलनीय है, और इसीलिए 'राष्ट्रपिता' का सम्मान उनके लिए उचित है।
लेकिन, जिस शक्ति ने वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य की कमर तोड़ी और उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर किया, वह नेताजी का सैन्य अभियान और उसका प्रभाव था। अंग्रेज़ अहिंसक जुलूसों को कुचलना जानते थे, लेकिन जब उनकी अपनी ही सेना (जिसके दम पर वे राज कर रहे थे) ने उनके खिलाफ बंदूक तान दी, तो उनके पास भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
नेताजी ने अपनी कूटनीति, अपने अदम्य साहस और अपने बलिदान से आज़ादी के उस दरवाज़े को तोड़ा, जिसे केवल सत्याग्रह से खोलना संभव नहीं हो पा रहा था। इसीलिए, भारत की स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 'फादर ऑफ़ फ्रीडम' कहना पूरी तरह से न्यायसंगत और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है।


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