लखनऊ, 14 जुलाई 2026: आज 14 जुलाई को उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी चंद्रभानु गुप्त का जन्मदिन है। इस अवसर पर उनके ...
लखनऊ, 14 जुलाई 2026: आज 14 जुलाई को उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी चंद्रभानु गुप्त का जन्मदिन है। इस अवसर पर उनके जीवन, संघर्ष, योगदान और विरासत को याद करना न केवल ऐतिहासिक न्याय है बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। चंद्रभानु गुप्त, जिन्हें सी.बी. गुप्त के नाम से भी जाना जाता था, मात्र 17 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और जीवन भर राष्ट्रसेवा में समर्पित रहे। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चार बार (कुल लगभग 3 वर्ष 10 माह) पद संभालने वाले एक कद्दावर नेता थे, जो शिक्षा, सामाजिक कल्याण और सांस्कृतिक विकास के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ गए।
जन्म और प्रारंभिक जीवन: आर्य समाज की छाया में पला एक योद्धा
चंद्रभानु गुप्त का जन्म 14 जुलाई 1902 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के बिजौली (या आत्रौली) गांव में हुआ था। उनके पिता हीरालाल गुप्त एक साधारण लेकिन सम्मानित व्यक्ति थे, जिन पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव था। इस प्रभाव ने युवा चंद्रभानु के चरित्र को आकार दिया – सादगी, साहस और समाज सुधार की भावना उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन गई।
बचपन से ही वे शरारती और जिज्ञासु स्वभाव के थे। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. और एलएल.बी. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे वकालत करने लगे। लेकिन किताबी ज्ञान ही उनका लक्ष्य नहीं था। 1919 में मात्र 17 वर्ष की आयु में वे रौलट एक्ट के विरोध में सीतापुर में प्रदर्शन में शामिल हुए। यह उनका स्वतंत्रता संग्राम में पहला कदम था, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया, जेल गए और कुल दस बार कारावास भोगा।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: काकोरी कांड के वकील
चंद्रभानु गुप्त स्वतंत्रता संग्राम के उन गिने-चुने वकीलों में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ने वाले क्रांतिकारियों की पैरवी की। वे काकोरी कांड (1925) के मामलों में रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों के बचाव पक्ष के वकीलों में शामिल थे। उस समय ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों को फांसी दिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी, लेकिन चंद्रभानु जैसे राष्ट्रभक्त वकीलों ने बिना किसी डर के केस लड़े।
1926 से वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बन गए। 1929 में लखनऊ कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। 1937 के चुनावों में वे विधानसभा सदस्य बने। 1946 में गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में संसदीय सचिव के रूप में शामिल हुए। स्वतंत्रता के बाद वे पंत और डॉ. संपूर्णानंद के कैबिनेट में विभिन्न विभागों के मंत्री रहे।
राजनीतिक उत्थान: मुख्यमंत्री के रूप में चुनौतीपूर्ण कार्यकाल
1952 के पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने लखनऊ सिटी ईस्ट से जीत हासिल की। 1960 में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल (7 दिसंबर 1960 से 2 अक्टूबर 1963) में राज्य की राजनीति में अस्थिरता थी, फिर भी उन्होंने स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया। कांगरेस की आंतरिक गुटबाजी और कामराज प्लान के तहत उन्हें 1963 में इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद सुचेता कृपलानी पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
1967 और 1969 में उन्होंने रानीखेत क्षेत्र से चुनाव जीता। 14 मार्च 1967 से 3 अप्रैल 1967 तक और फिर 26 फरवरी 1969 से 18 फरवरी 1970 तक वे मुख्यमंत्री रहे। कुल मिलाकर चार बार मुख्यमंत्री पद संभालने के बावजूद उनका कोई कार्यकाल पूर्ण पांच वर्ष का नहीं रहा, लेकिन वे यूपी राजनीति के एक शक्तिशाली स्तंभ बने रहे। वे कांग्रेस (ओ) में शामिल हुए और बाद में जनता पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी बने।
शिक्षा और सामाजिक कल्याण में अमिट योगदान
चंद्रभानु गुप्त का सबसे बड़ा योगदान शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में है। वे मोतीलाल नेहरू मेमोरियल सोसाइटी के मुख्य प्रेरक थे, जिसने लखनऊ में कई संस्थाएं स्थापित कीं। इनमें शामिल हैं:
- रवींद्रालय
- बाल संग्रहालय (चिल्ड्रेंस म्यूजियम)
- बाल विद्या मंदिर
- आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास
- होम्योपैथिक अस्पताल
- नेशनल पी.जी. कॉलेज सहित अनेक डिग्री कॉलेज
- पब्लिक लाइब्रेरी
नर्मल चंद्र चतुर्वेदी जैसे सलाहकारों के साथ उन्होंने लखनऊ के सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक विकास के अनेक कार्यक्रम शुरू किए। के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम भी उनके प्रयासों का परिणाम माना जाता है। वे छात्रों के कल्याण, महिलाओं के उत्थान और पिछड़ों के समावेश के पक्षधर थे।
व्यक्तिगत जीवन: सादगी का प्रतीक
चंद्रभानु गुप्त अविवाहित रहे। उनका जीवन सादगी, ईमानदारी और सहज स्वभाव के लिए जाना जाता था। उन्होंने कभी परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया। 1970 के दशक में स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद वे राजनीति में सक्रिय रहे। 11 मार्च 1980 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ। उनकी विरासत आज भी लखनऊ और पूरे उत्तर प्रदेश में जीवित है।
विरासत और प्रासंगिकता
आज जब हम विकास, शिक्षा और राजनीतिक स्थिरता की बात करते हैं, चंद्रभानु गुप्त का जीवन एक मिसाल है। उन्होंने ब्रिटिश जेलों से लेकर मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय किया, लेकिन कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनके योगदान ने उत्तर प्रदेश को शिक्षा के केंद्र के रूप में मजबूत किया।
उनके समकालीन नेताओं जैसे गोविंद बल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी और चरण सिंह के साथ उनका संबंध राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद सम्मानपूर्ण था। आज की पीढ़ी को उनके जीवन से सीखना चाहिए कि सच्ची सेवा बिना स्वार्थ के होती है।
निष्कर्ष: चंद्रभानु गुप्त केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक युग के साक्षी थे। स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनका योगदान अविस्मरणीय है। आज उनके जन्मदिन पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और संकल्प लेते हैं कि उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे। उनकी याद हमें प्रेरित करती रहेगी – “सफर कहीं रुका नहीं, झुका नहीं”।

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