जोधपुर-दिल्ली, 20 जून 2026 – बॉलीवुड के “भाईजान” सलमान खान और उनकी पूरी “एंड कंपनी” को एक बार फिर कानून का करारा तमाचा पड़ा है। दिल्ली हाईक...
जोधपुर-दिल्ली, 20 जून 2026 – बॉलीवुड के “भाईजान” सलमान खान और उनकी पूरी “एंड कंपनी” को एक बार फिर कानून का करारा तमाचा पड़ा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सलमान की याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने फिल्म काला हिरण: द बैटल फॉर लिगेसी की रिलीज रोकने की मांग की थी। राजस्थान हाईकोर्ट में भी काला हिरण शिकार मामले की सुनवाई में एक जज ने खुद को अलग कर लिया, जिससे मामला और लटक गया। लेकिन सच तो यह है – काला हिरण को कोई नहीं रोक सकता। न सलमान की पावर, न उनकी लीगल टीम, न ही उनके “कनेक्शन्स”।
हाईकोर्ट का तमाचा: “भाई, पहले डॉक्यूमेंट्स तो दो!”
दिल्ली हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच (जस्टिस मधु जैन) ने सलमान खान की याचिका पर सुनवाई को 1 जुलाई तक टाल दिया। कोर्ट ने साफ कहा – सलमान साहब, फिल्म मेकर्स को पूरी याचिका और सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स सर्व करो, फिर बात होगी। कोई अंतरिम स्टे नहीं, कोई तुरंत रोक नहीं। सलमान का दावा था कि फिल्म उनके पर्सनालिटी राइट्स का उल्लंघन करती है, 1998 के काला हिरण मामले और लॉरेंस बिश्नोई वाले एंगल को बिना अनुमति इस्तेमाल कर रही है। लेकिन कोर्ट ने कहा – पहले पूरा केस दो, फिर देखेंगे।
यह तमाचा इसलिए और जोरदार है क्योंकि सलमान की टीम पहले ही लीगल नोटिस भेज चुकी थी, पोस्टर्स हटाने की मांग की थी। लेकिन फिल्म प्रोड्यूसर अमित जानी और डायरेक्टर ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। “कोई हमें नहीं रोक सकता” – यही तो मैसेज है। काला हिरण दौड़ रहा है, और सलमान एंड कंपनी उसे पकड़ने की कोशिश में खुद थक रहे हैं।
व्यंग की बात: अरे भाईजान, 28 साल पुराना केस अभी भी आपके सिर पर लटक रहा है, और आप दूसरों को फिल्म बनाने से रोकना चाहते हो? यह तो वैसा है जैसे कोई चोर पड़ोसी के घर में घुसकर चोरी करने के बाद पड़ोसी को कहे – “भाई, मेरी कहानी मत लिखना, वरना मुकदमा कर दूंगा।” कानून तो कहता है – पब्लिक फिगर की लाइफ पब्लिक डोमेन में आ जाती है, खासकर जब वह विवादास्पद हो। पर्सनालिटी राइट्स का हवाला देकर सच्चाई को दबाना इतना आसान नहीं।
काला हिरण शिकार केस: 28 साल की सच्चाई जो दब नहीं रही
याद कीजिए 1998। फिल्म हम साथ साथ हैं की शूटिंग के दौरान जोधपुर के कांकाणी गांव के पास काला हिरण (ब्लैकबक) और चिंकारा का शिकार। वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा 9/51 के तहत केस दर्ज। सलमान मुख्य आरोपी। अन्य नाम – सैफ अली खान, तब्बू, सोनाली बेंद्रे, नीलम आदि।
- 2018: जोधपुर ट्रायल कोर्ट ने सलमान को 5 साल की सजा सुनाई। जेल गए, जमानत मिली।
- राजस्थान हाईकोर्ट: कुछ मामलों में बरी, लेकिन मुख्य केस लटका रहा। राज्य सरकार ने अपील की।
- 2026 अपडेट: राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने सुनवाई से इनकार कर दिया। मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर। सलमान की अपील और राज्य की अपील साथ सुनवाई हो रही है। देरी होती जा रही है, लेकिन केस जीवित है।
कानूनी नजरिया: वाइल्डलाइफ एक्ट सख्त है। लुप्तप्राय प्रजाति का शिकार गंभीर अपराध। सबूतों की कमी का हवाला दिया गया कुछ फैसलों में, लेकिन गवाहों के बयान, लोकल लोगों की शिकायतें, और घटना का समय – सब कुछ सामने है। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा। अब हाईकोर्ट में क्लब्ड सुनवाई। देरी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन यह दिखाती है कि स्टार पावर हमेशा काम नहीं करती।
जोरदार व्यंग: भाईजान, आप तो “बेवकूफ इश्क” और “टाइगर” बनकर जानवरों को बचाने के हीरो बने घूमते हैं, लेकिन असल जिंदगी में काला हिरण आपके नाम से कांपता था? शूटिंग के बहाने शिकार? और अब जब कोई फिल्म उस सच्चाई को दिखाना चाहे तो पर्सनालिटी राइट्स? अरे, पर्सनालिटी तो पहले बनाओ जो साफ-सुथरी हो। 28 साल से केस चल रहा है, जमानत पर बाहर, अपील-अपील खेल रहे हो। आम आदमी होता तो सालों जेल में सड़ जाता। लेकिन आप “भाई” हो न, “बोलो भाई”।
सलमान एंड कंपनी की रणनीति: दबाओ, डराओ, डिले करो
सलमान की लीगल टीम ने फिल्म मेकर्स को नोटिस भेजा, मौत की धमकी का जिक्र आया (प्रोड्यूसर की तरफ से), लेकिन कोर्ट ने अंतरिम राहत नहीं दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा – पूरा प्लेंट सर्व करो, डिफेंस को मौका दो।
यह “एंड कंपनी” की पुरानी आदत है। कोई विवाद हो तो लीगल नोटिस, PR मैनेजमेंट, और अगर न चले तो “विक्टिम कार्ड”। लेकिन इस बार काला हिरण फिल्म की टीम भी तैयार लग रही है। उन्होंने कहा – “यह फिक्शनल है, इंस्पायर्ड बाय इवेंट्स।” कानून में फेयर यूज और फ्री स्पीच का दायरा काफी चौड़ा है, खासकर पब्लिक इंटरेस्ट वाले मुद्दों में।
व्यंग: सलमान साहब, आपने तो खुद कई फिल्मों में रियल लाइफ इंस्पायर्ड रोल किए। अब जब आपकी कहानी बन रही है तो परेशानी? शायद इसलिए कि यह “बैटल फॉर लिगेसी” आपकी “लीगेसी” को चैलेंज कर रही है – वह लीगेसी जो काला हिरण, हिट एंड रन, और दूसरे विवादों से भरी पड़ी है। काला हिरण दौड़ रहा है – सच्चाई की तरफ।
कानून क्या कहता है? और क्यों नहीं रुक रहा काला हिरण?
भारतीय कानून में:
- पर्सनालिटी राइट्स: सेलिब्रिटी का नाम, इमेज, लाइफस्टाइल प्रोटेक्टेड, लेकिन अगर घटना पब्लिक रिकॉर्ड है और फिल्म फिक्शनल तरीके से बनी है तो रोकना मुश्किल।
- डिफेमेशन: अगर गलत तरीके से चित्रण हो तो केस, लेकिन ट्रुथ इज डिफेंस।
- वाइल्डलाइफ केस: अभी भी पेंडिंग। हाईकोर्ट की देरी के बावजूद, न्याय की प्रक्रिया चल रही है। जज का रिक्यूजल सामान्य है, लेकिन यह दिखाता है कि मामला संवेदनशील है।
जोरदार व्यंग: सलमान एंड कंपनी सोचती है कि पैसे, पावर और PR से सब कुछ कंट्रोल कर लेंगे। लेकिन हाईकोर्ट ने तमाचा मार दिया – “पहले डॉक्यूमेंट दो”। मतलब, तुम्हारी स्टोरी में कितने झूठ हैं, वो पहले दिखाओ। काला हिरण जंगल का राजा नहीं, लेकिन सच्चाई का प्रतीक बन गया। इसे गोली मारकर, केस लटकाकर, या फिल्म रोककर कोई नहीं मार सकता।
28 साल की कहानी: आम आदमी vs स्टार पावर
1998 में शूटिंग, शिकार, केस, गिरफ्तारी, जमानत, सजा, अपील, बरी, फिर अपील... यह लूप कभी खत्म नहीं होता। लोकल गवाह, वन विभाग के अधिकारी, मीडिया रिपोर्ट्स – सब कुछ मौजूद। लेकिन स्टारडम ने केस को दशकों तक खींचा। आम शिकारी होता तो आज जेल में होता।
फिल्म काला हिरण इसी सच्चाई को उजागर कर रही है। इसमें लॉरेंस बिश्नोई एंगल भी, जो बाद में सलमान को धमकी देता रहा। पूरी लीगेसी बैटल – पावर, पैसा, और न्याय के बीच।
व्यंग: भाईजान, आप “दबंग” बनकर गावों में घूमते हो, लेकिन काला हिरण वाला दबंगपन याद आते ही कोर्ट दौड़ते हो। कानून सबके लिए बराबर है, लेकिन अमीरों के लिए थोड़ा “डिले” वाला। फिर भी, हाईकोर्ट ने दिखा दिया – तमाचा पड़ेगा।
निष्कर्ष: काला हिरण दौड़ता रहेगा
सलमान एंड कंपनी को हाईकोर्ट का तमाचा याद रहेगा। 1 जुलाई को फिर सुनवाई। राजस्थान हाईकोर्ट में नई बेंच। लेकिन सच्चाई रुकेगी नहीं। फिल्म बनेगी, केस चलेगा, और जनता जान जाएगी – स्टार कितने भी बड़े हों, कानून और सच्चाई से ऊपर नहीं।
काला हिरण को चलने नहीं रोक सकता कोई। न गोली, न मुकदमा, न ताकत। यह दौड़ता रहेगा – जंगलों में, कोर्ट में, और अब स्क्रीन्स पर।


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