आजाद की मां की दुखभरी कहानी: मूर्ति तक न लगने दी कांग्रेस ने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में अनगिनत बलिदान हुए, लेकिन कुछ कहानियां इतनी दर्द...
आजाद की मां की दुखभरी कहानी: मूर्ति तक न लगने दी कांग्रेस ने
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में अनगिनत बलिदान हुए, लेकिन कुछ कहानियां इतनी दर्द भरी हैं कि वे सदियों तक दिल को चीरती रहती हैं। ऐसी ही एक कहानी है अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की मां जगरानी देवी की। एक मां, जिसने अपना लाल देश की आजादी पर न्योछावर कर दिया, लेकिन स्वतंत्र भारत में उसी कांग्रेस सरकार ने उन्हें न सिर्फ भुला दिया, बल्कि उनकी स्मृति को भी मिटाने की कोशिश की। मूर्ति लगाने तक नहीं दी गई। यह कहानी सिर्फ एक मां के दर्द की नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के प्रति कांग्रेस की सोच की भी है।
जगरानी देवी का परिवार और चंदू का जन्म
जगरानी देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के बदरका गांव में हुआ था। उनका विवाह सीताराम तिवारी से हुआ। सीताराम पहले दो विवाह कर चुके थे, लेकिन दोनों पत्नियां युवावस्था में ही चल बसीं। जगरानी तीसरी पत्नी थीं। परिवार गरीब था, लेकिन देशभक्ति की ज्योति उनमें पहले से जल रही थी।
उनके पांच पुत्र हुए – सबसे छोटे थे चंद्रशेखर, जिन्हें घर में प्यार से चंदू कहते थे। चंदू बचपन से ही साहसी और देशभक्त थे। मां जगरानी उन्हें संस्कृत पढ़ाने के लिए काशी भेजना चाहती थीं, ताकि वे विद्वान बनें। लेकिन चंदू की किस्मत कुछ और थी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उन्हें क्रांति की राह पर धकेल दिया। मात्र 15-16 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी।
जगरानी देवी जानती थीं कि उनका बेटा खतरनाक रास्ते पर है, लेकिन वे कभी रोकर या मना कर उसे नहीं रोका। वे गर्व से कहतीं – “मेरा चंदू देश के लिए लड़ रहा है।” चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA, बाद में HSRA) के प्रमुख बन गए। वे ब्रिटिश पुलिस के लिए सिरदर्द थे। अल्लाहाबाद के आल्फ्रेड पार्क (अब आजाद पार्क) में 27 फरवरी 1931 को उन्होंने अपनी आखिरी गोली खुद को मार ली, ताकि अंग्रेज उन्हें जिंदा न पकड़ सकें। “आजाद” शब्द उनके नाम के साथ हमेशा जुड़ गया।
शहादत के बाद मां का दर्द
चंद्रशेखर आजाद की शहादत की खबर उनके परिवार को तुरंत नहीं पहुंची। कई महीनों बाद जब जगरानी देवी को पता चला कि उनका चंदू शहीद हो गया, तो पूरा गांव उन्हें “डाकू की मां” कहकर ताने मारने लगा। समाज ने बहिष्कार कर दिया। कोई उनके घर पानी भरने नहीं आता, न ही कोई मदद करता।
जगरानी देवी ने हार नहीं मानी। वे जंगल से लकड़ियां काटकर बेचतीं, गोबर के उपले बनातीं और कोदो-मोटा अनाज खरीदकर गुजारा करतीं। कभी-कभी दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती। वे कहतीं – “मेरा बेटा देश के लिए मरा, मैं उसके नाम पर भीख नहीं मांगूंगी।” क्रांतिकारी साथी सदाशिव मलकापुर (या सदाशिव राव) ने उन्हें झांसी ले जाकर संभाला। झांसी में ही 1951 में जगरानी देवी ने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार बड़ागांव गेट के बाहर मुक्तिधाम में किया गया।
स्वतंत्र भारत में उपेक्षा
1947 में देश आजाद हो गया। कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन जगरानी देवी जैसी शहीद माताओं को कोई पेंशन, सम्मान या मदद नहीं मिली। जबकि गांधीवादी नेताओं और उनके परिवारों को सुविधाएं मिल रही थीं, क्रांतिकारियों की माताएं भूखी मर रही थीं। जगरानी देवी को “डाकू की मां” का कलंक लगाकर समाज और सरकार दोनों ने उपेक्षा की।
क्रांतिकारी साथियों ने सोचा कि कम से कम मृत्यु के बाद उन्हें सम्मान दिया जाए। उन्होंने जगरानी देवी की मूर्ति बनवाई। शिल्पकार रुद्र नारायण सिंह ने फोटो देखकर मूर्ति तैयार की। मुक्तिधाम में स्थापना का कार्यक्रम तय हुआ। लेकिन जैसे ही कांग्रेस सरकार (तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में) को पता चला, आग बबूला हो गई।
सरकार ने इसे “देश, समाज और कानून-व्यवस्था” के खिलाफ बताया। पुलिस तैनात कर दी गई। मूर्ति स्थापना स्थल पर भारी सुरक्षा बल लगा दिया गया। क्रांतिकारियों को धमकाया गया। मूर्ति लगाने की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस की नजर में चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी “आतंकवादी” या “डाकू” थे, जिनकी मां को सम्मान नहीं दिया जा सकता था। यह कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा की संकीर्णता थी, जो क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को हाशिए पर रखती थी।
71 साल बाद न्याय
जगरानी देवी की मूर्ति लगाने की कोशिशें दशकों तक चलीं, लेकिन कांग्रेस शासन में कभी सफलता नहीं मिली। आखिरकार, 25 जुलाई 2023 को – उनकी मृत्यु के 71 साल बाद – झांसी के उसी मुक्तिधाम में उनकी मूर्ति स्थापित की गई। यह देर से आए न्याय का प्रतीक था।
यह कहानी हमें कई सबक देती है। पहला – बलिदान की कीमत कभी न भूलें। दूसरा – राजनीतिक दलों की विचारधारा कभी-कभी राष्ट्र के सच्चे नायकों को छोटा कर देती है। कांग्रेस ने चंद्रशेखर आजाद की शहादत को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। नेहरू युग में क्रांतिकारियों को कम महत्व दिया गया। आजाद की मां को पांच फुट जमीन और सम्मान भी मुश्किल से मिला।
आज की प्रासंगिकता
आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो जगरानी देवी जैसी माताओं को याद करना जरूरी है। वे मांएं जो चुपचाप रोती रहीं, लेकिन कभी टूटी नहीं। वे मांएं जिन्होंने देश को सपूत दिए, लेकिन बदले में उपेक्षा पाई।
चंद्रशेखर आजाद का संदेश था – “मैं आजाद रहूंगा या मर जाऊंगा।” उनकी मां ने भी वही जिंदगी जिया – सम्मान के बिना, लेकिन गर्व के साथ। आज की पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि स्वतंत्रता सिर्फ नेताओं की देन नहीं, बल्कि हजारों अनाम जगरानी देवियों की कुर्बानियों का नतीजा है।


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