लेखक: डॉ. शंकर शरण (मूल प्रेरणा से) तथा विस्तारित विश्लेषण लगभग आरंभ से ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में...
लेखक: डॉ. शंकर शरण (मूल प्रेरणा से) तथा विस्तारित विश्लेषण
लगभग आरंभ से ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में अपनी "वैज्ञानिक" विचारधारा के प्रति घोर अहंकार रहा है। लेकिन इतिहास, वर्तमान और भविष्य के मूल्यांकन में बार-बार उनकी मूढ़ता उजागर हुई है। यह कोई एक देश या एक घटना की बात नहीं, बल्कि वैश्विक पैटर्न है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज (INA) के प्रति उनका रवैया।
1940-45 का घोर अपमान: तथ्य और प्रमाण
1940 में CPI द्वारा प्रकाशित पुस्तिका Unmasked Parties and Politics (बेनकाब दल व राजनीति) में नेताजी को 'अंधा मसीहा' कहा गया और उनके काम को "सिद्धांतहीन अवसरवाद" बताया गया।
धीरे-धीरे यह आलोचना गाली-गलौज में बदल गई। कम्युनिस्ट मुखपत्रों में नेताजी और INA को निम्नलिखित विशेषण दिए गए:
- 'काला गिरोह'
- 'गद्दार बोस'
- 'दुश्मन के जरखरीद एजेंट'
- 'तोजो (जापानी प्रधानमंत्री) और हिटलर के अगुआ दस्ते'
- 'राजनीतिक कीड़े'
- 'सड़ा हुआ अंग जिसे काटकर फेंकना है'
People's War (CPI का मुखपत्र) और People's Daily में ये हमले चरम पर पहुंचे। 10 जनवरी 1943 को CPI के प्रमुख नेता बी.टी. रणदिवे ने लेख लिखा जिसमें बोस को 'जापानी साम्राज्यवाद का गुंडा' और INA को 'भारतीय भूमि पर लूट, डाका, विध्वंस मचाने वाला भाड़े का सैनिक' बताया गया।
सबसे घृणित थे कार्टून। Sitaram Goel जैसे इतिहासकारों ने इन्हें संकलित किया है। इनमें नेताजी को:
- जापानी-जर्मन फासिस्टों का कुत्ता या बिल्ली दिखाया गया (जिससे मालिक खेलता है)।
- तोजो का मुखौटा।
- भारतवासियों पर जापानी बम गिराने वाला।
- गांधीजी की बकरी छीनने वाला।
- तोजो एक गधे (बोस का चेहरा) पर सवार।
- 'तोजो का पालतू क्षुद्र बौना'।
ये कार्टून People's War पत्रिका में 1942-43 के आसपास प्रकाशित हुए।
वैचारिक आधार: स्टालिन-हिटलर समझौते की कालिख
कम्युनिस्टों का यह रुख संयोग नहीं था। WWII में सोवियत संघ-ब्रिटेन गठबंधन के बाद CPI ने 'पीपुल्स वॉर' लाइन अपनाई — यानी ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन। नेताजी ने जापान-जर्मनी की मदद से स्वतंत्रता के लिए INA बनाई, तो वे "फासिस्ट एजेंट" बन गए।
यह वही कम्युनिस्ट थे जो 1939 में सोवियत-नाजी समझौते (Molotov-Ribbentrop Pact) का समर्थन कर रहे थे, लेकिन बोस को फासिस्ट कहते थे। उनकी विचारधारा तथ्यों पर आधारित नहीं, बल्कि मॉस्को से आने वाले निर्देशों पर टिकी थी।
उलटफेर: लोकप्रियता बढ़ने पर रुख बदलना
जब INA की लोकप्रियता बढ़ी और Red Fort ट्रायल (1945-46) के बाद देशभर में उबाल आया, तो कम्युनिस्टों ने अचानक INA सिपाहियों के समर्थन में प्रदर्शन शुरू कर दिए। Calcutta में वे हड़तालें आयोजित करने लगे। यह स्पष्ट अवसरवाद था — सिद्धांत नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा।
बाद के वर्षों में भी उन्होंने इसे "गलती" माना। 2003 में CPM ने इसे "60 वर्ष की घोर गलती" कहा। CPI नेता A.B. Bardhan ने भी माना कि Netaji की भावना को नहीं समझ पाए। लेकिन ये स्वीकारोक्ति देर से आईं और मुख्यधारा में प्रचारित नहीं हुईं।
व्यापक पैटर्न: जड़ अंधविश्वास
यह अकेला उदाहरण नहीं। कम्युनिस्टों ने:
- जयप्रकाश नारायण को भी गाली दी।
- गांधीजी को "बुर्जुआ" कहा।
- आरएसएस को "तालिबान-अलकायदा" जैसा बताया (आज भी कुछ वामपंथी ऐसा करते हैं)।
- अयोध्या, कश्मीर, गोधरा, इस्लामी आतंकवाद जैसे मुद्दों पर तथ्यों से परे जिद्दी रुख अपनाया।
Sitaram Goel ने अपनी पुस्तकों (Netaji and the CPI आदि) में इन दस्तावेजों को विस्तार से उजागर किया। उनकी किताबें दर्शाती हैं कि यह "बनी-बनाई विचारधारा" में अंधविश्वास था, जो तथ्यों को विकृत करता था।
नेहरूवादी-कम्युनिस्ट गठजोड़ का असर
स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक इतिहास लेखन, शिक्षा और मीडिया पर इस गठजोड़ का वर्चस्व रहा। परिणामस्वरूप:
- नेताजी की विरासत को कम आंका गया (हालांकि आज सरकारी प्रयासों से पुनरुत्थान हो रहा है)।
- राष्ट्रवादी विचारों को "सांप्रदायिक" करार दिया गया।
- युवा पीढ़ी को विकृत आख्यान दिए गए।
सबक क्या है?
- विचारधारा की कैद से ऊपर उठकर तथ्यों को देखना जरूरी है।
- देशभक्ति को विदेशी केंद्रों (मॉस्को, बीजिंग) से निर्देशित एजेंडे के आगे नहीं झुकना चाहिए।
- अवसरवाद की राजनीति लंबे समय में विश्वसनीयता खो देती है — जैसा कम्युनिस्टों के साथ हुआ।
- आज भी "प्रगतिशील", "सेक्युलर" शब्दों की आड़ में वही हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी पैटर्न कुछ हद तक दिखता है, जिसे युवाओं को पहचानना चाहिए।
नेताजी का संदेश था — "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा"। उन्होंने विदेशी ताकतों का इस्तेमाल भारत के लिए किया, न कि भारत को विदेशी ताकतों के लिए। कम्युनिस्टों ने ठीक उलटा किया — विदेशी निर्देशों के लिए राष्ट्रवाद को कुर्बान किया।
यह लेख तथ्यों पर आधारित है। उद्देश्य इतिहास से सीखना है, न कि घृणा फैलाना। सच्चा देशभक्त कभी अंधा नहीं होता। नेताजी अमर रहें। जय हिंद!


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