बड़ा खुलासा! उज्जवल दीवान की RTI का जवाब आया – “संविधान से चित्र हटाने का कोई आदेश नहीं” छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से उज्जवल दीवान, जो **संयुक...
बड़ा खुलासा! उज्जवल दीवान की RTI का जवाब आया – “संविधान से चित्र हटाने का कोई आदेश नहीं”
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से उज्जवल दीवान, जो **संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ** के संस्थापक अध्यक्ष हैं और ATV न्यूज चैनल के प्रदेश चेयरमैन भी, ने एक बार फिर राष्ट्रहित का मुद्दा उठाया है। उन्होंने संविधान के प्रकाशन और उसमें “गायब” 22 देवी-देवताओं व महापुरुषों की पेंटिंग्स पर RTI दायर की थी। अब 1 अप्रैल 2026 को भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय, विधायी विभाग, प्रकाशन अनुभाग से जवाब आ चुका है। जवाब सीधा और स्पष्ट है, लेकिन इसमें छिपा है संविधान की मूल प्रति और प्रकाशित प्रतियों के बीच का पूरा राज।
**RTI का नंबर और जवाब का पूरा ब्योरा**
RTI आवेदन संख्या: LEGIS/R/P/26/00030, दिनांक 02.03.2026 (इस अनुभाग को 19.03.2026 को प्राप्त हुआ)।
जवाब पत्र (कमरा संख्या 428E, चौथी मंजिल, शास्त्री भवन, नई दिल्ली) में प्रकाशन अनुभाग के अधिकारी दामोदर प्रसाद महतो (CPIAO एवं अनुभाग अधिकारी) ने लिखा है:
“प्रकाशन अनुभाग केवल संविधान का मूल पाठ प्रकाशित करता है और भारत सरकार द्वारा संविधान से देवी-देवताओं और महापुरुषों के चित्रों को हटाने का आदेश इस अनुभाग में उपलब्ध नहीं है।”
यदि उज्जवल दीवान इस जानकारी से संतुष्ट नहीं हैं तो वे 30 दिनों के अंदर प्रथम अपीलीय प्राधिकारी श्री दीपक बागसिंह (कमरा 414E, शास्त्री भवन) के पास अपील कर सकते हैं। फोन नंबर भी दिया गया है – 233839661।
पत्र में साफ शब्दों में कहा गया है कि विभाग का काम सिर्फ “मूल पाठ” (bare text) प्रकाशित करना है। चित्र हटाने का कोई सरकारी आदेश उनके रिकॉर्ड में नहीं है। यह जवाब उन लोगों के लिए बड़ा झटका है जो मानते थे कि किसी ने जानबूझकर संविधान की सांस्कृतिक छवियों को “सेकुलर” बनाने के नाम पर हटा दिया।
**22 चित्रों की कहानी – मूल संविधान का अनछुआ राज**
भारतीय संविधान की मूल प्रति (जो आज संसद पुस्तकालय में सुरक्षित है) एक कलात्मक चमत्कार है। 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत और 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षरित इस दस्तावेज़ की 22 भागों (Parts) की शुरुआत में 22 हाथ से बनी पेंटिंग्स हैं। ये पेंटिंग्स विश्वविख्यात कलाकार नंदलाल बोस और उनकी शांतिनिकेतन टीम ने बनाई थीं।
ये चित्र क्रमबद्ध हैं – मोहनजो-दारो काल से शुरू होकर वैदिक काल, महाकाव्य काल, मौर्य काल, गुप्त काल, मध्यकाल, स्वतंत्रता संग्राम तक जाते हैं। इनमें ऐतिहासिक घटनाएं, महापुरुष, प्राचीन सभ्यता के प्रतीक और कुछ महाकाव्यीय/सांस्कृतिक दृश्य भी हैं। कुछ लोग इन्हें “देवी-देवताओं और महापुरुषों” की पेंटिंग्स कहते हैं क्योंकि इनमें रामायण-महाभारत के संदर्भ, बौद्ध-जैन प्रतीक और हिंदू-सांस्कृतिक तत्व दिखते हैं। वास्तव में ये 22 चित्र भारत की सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत दस्तावेज़ हैं, न कि किसी एक धर्म के प्रतीक।
मूल प्रति पर हर पेज पर सुंदर बॉर्डर और कैलिग्राफी भी है। लेकिन जनता के लिए जो “संविधान की किताब” बाजार में या सरकारी प्रकाशनों में आती है, वह सिर्फ टेक्स्ट वाली होती है। यही वजह है कि “22 चित्र गायब” वाली चर्चा चलती रहती है। हाल ही में राज्यसभा में भी इस मुद्दे पर सवाल उठा था कि प्रकाशित प्रतियों में ये चित्र क्यों नहीं हैं।
**RTI जवाब का गहन विश्लेषण**
1. **सरकारी पक्ष स्पष्ट**: प्रकाशन अनुभाग ने “मूल पाठ” शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका मतलब है कि संविधान का कानूनी मूल्य सिर्फ शब्दों में है, चित्रों में नहीं। चित्र सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व के लिए हैं, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावित नहीं करते। इसलिए “हटाने का आदेश” की जरूरत ही नहीं पड़ी। विभाग ने साफ कहा – हम चित्र छापते ही नहीं, तो हटाने का सवाल कहां?
2. **कॉन्स्पिरेसी थ्योरी पर पानी फेरा**: कई लोग मानते थे कि नेहरू काल या बाद में किसी ने जानबूझकर चित्र हटाए ताकि संविधान “धर्मनिरपेक्ष” दिखे। RTI जवाब इस थ्योरी को कमजोर करता है। कोई “हटाने का आदेश” उपलब्ध नहीं है। वास्तविकता यह है कि मूल प्रति एकमात्र हस्तलिखित कलात्मक दस्तावेज़ है। बड़े पैमाने पर छपाई के लिए सिर्फ टेक्स्ट रखना व्यावहारिक, सस्ता और सटीक है। चित्र छापने से लागत बढ़ती, गलती का खतरा रहता और कानूनी संदर्भ जटिल हो जाता।
3. **संस्कृति vs व्यावहारिकता का संघर्ष**: उज्जवल दीवान का RTI राष्ट्रवादी दृष्टिकोण दर्शाता है। वे चाहते हैं कि संविधान की सांस्कृतिक विरासत हर नागरिक तक पहुंचे। लेकिन सरकार का जवाब व्यावहारिक है – मूल प्रति संसद में है, हर किताब में चित्र छापना जरूरी नहीं। फिर भी सवाल उठता है: क्या आज के डिजिटल युग में मूल 22 चित्रों वाली fully illustrated edition जारी की जा सकती है? स्कूलों-कॉलेजों में वितरित की जा सकती है? इससे युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों का एहसास हो सकता है।
4. **RTI की ताकत**: यह RTI दिखाती है कि सूचना का अधिकार कितना शक्तिशाली है। एक साधारण नागरिक (जो पुलिस कर्मचारियों के हितों की लड़ाई लड़ते हैं और न्यूज चैनल चलाते हैं) ने केंद्र सरकार के मंत्रालय को जवाबदेह बनाया। जवाब में “उपलब्ध नहीं है” शब्द महत्वपूर्ण है। यह नकारात्मक जवाब नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की सच्चाई है। यदि अपील की गई तो और गहराई तक जा सकता है – क्या कोई अन्य विभाग (जैसे संस्कृति मंत्रालय) इस पर काम कर रहा है?
5. **वर्तमान संदर्भ**: आज जब “भारत की सनातन विरासत” पर बहस तेज है, यह RTI और जवाब दोनों पक्षों को सोचने पर मजबूर करता है। संविधान सेकुलर है, लेकिन उसकी कलात्मक प्रस्तुति सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है। 22 चित्र हटाने की साजिश नहीं, बल्कि प्रकाशन की परंपरा का हिस्सा हैं। फिर भी, अगर सरकार चाहे तो नई illustrated editions जारी कर सकती है – जैसे पुरानी संस्करणों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है।
**उज्जवल दीवान का योगदान**
उज्जवल दीवान लंबे समय से पुलिस कर्मचारियों, उनके परिवारों और सामाजिक मुद्दों की लड़ाई लड़ रहे हैं। संयुक्त पुलिस संघ के माध्यम से उन्होंने कई बार विधानसभा घेराव, कोर्ट केस और आंदोलन किए हैं। ATV न्यूज चैनल के प्रदेश चेयरमैन के रूप में वे छत्तीसगढ़ की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाते हैं। यह RTI भी उसी क्रम में है – संविधान को सिर्फ कानूनी किताब नहीं, सांस्कृतिक धरोहर मानकर। उनका प्रयास सराहनीय है क्योंकि इससे आम जनता को संविधान की “अदृश्य” कलात्मकता का पता चला।
**भविष्य क्या?**
यदि दीवान अपील करते हैं तो शायद संस्कृति मंत्रालय या संसद सचिवालय से और जानकारी मिले। हो सकता है सरकार मूल 22 चित्रों को अलग से पब्लिश करे या डिजिटल संस्करण जारी करे। इससे विवाद का समाधान हो सकता है।
**और अंत में – संविधान के साथ एक मजाक!**
संविधान के साथ एक मजाक तो यह है:
एक आदमी संविधान से पूछता है, “भाई, तुम्हारे 22 चित्र कहां गायब हो गए?”
संविधान हंसकर बोला, “अरे, मैं तो मूल पाठ हूं! चित्र तो प्रकाशन विभाग में नहीं, मेरे दिल में हैं... और तुम्हारे दिल में भी! बस, अब तुम्हें उन्हें पढ़ने की बजाय महसूस करना है। वरना RTI लगाते-लगाते पूरा जीवन निकल जाएगा!”
(मजाक तो मजाक है, लेकिन सच्चाई यही है – संविधान शब्दों में जीता है, लेकिन चित्रों में उसकी आत्मा दिखती है।)
यह RTI जवाब सिर्फ एक पत्र नहीं, बल्कि संविधान की दो शक्लों – कानूनी और सांस्कृतिक – के बीच के पुल का संकेत है। उज्जवल दीवान ने जो सवाल उठाया, वह हर भारतीय को सोचने पर मजबूर करता है। क्या हम अपनी विरासत को सिर्फ किताबों में रखेंगे या हर प्रकाशित प्रतिमें भी जीवंत बनाएंगे? जवाब आपके हाथ में है।

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