विकास के मंच पर तालियां बजीं, लेकिन क्षेत्र के प्रतिनिधि का नाम ही गायब! गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश), 29 मार्च 2026 — कल 28 मार्च को प्रधान...
गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश), 29 मार्च 2026 — कल 28 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर एयरपोर्ट) के पहले चरण का भव्य उद्घाटन किया। दिल्ली-एनसीआर का दूसरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन चुका है, जिसकी आधारशिला नवंबर 2021 में रखी गई थी। चार साल बाद यह सपना हकीकत बन गया। प्रधानमंत्री के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री किंजरापु राम मोहन नायडू और अन्य गणमान्य व्यक्ति मंच पर थे। हजारों की भीड़, फ्लैशलाइट्स की रोशनी, तालियों की गड़गड़ाहट और “विकास की उड़ान” के नारे — सब कुछ था। लेकिन जेवर विधानसभा क्षेत्र के विधायक धीरेंद्र सिंह का नाम उद्घाटन शिलापट्ट (शिलापत्र) पर गायब था। यही एक छोटी-सी अनुपस्थिति अब पूरे क्षेत्र में ‘सम्मान बनाम उपेक्षा’ की बड़ी बहस छेड़ गई है।
स्थानीय लोग, किसान और धीरेंद्र सिंह के समर्थक इसे सीधा अपमान मान रहे हैं। उनका तर्क है — जिस जमीन पर एयरपोर्ट खड़ा हुआ, जिस क्षेत्र के हजारों किसानों ने घर-बार, खेती-किसानी छोड़ी, विस्थापन झेला और सालों तक संघर्ष किया, उसी क्षेत्र के चुने हुए प्रतिनिधि को श्रेय के मंच पर जगह क्यों नहीं दी गई? सोशल मीडिया पर पोस्ट्स वायरल हो रही हैं — “विकास नहीं, दिखावा”, “जेवर ने जमीन दी, लेकिन नाम नहीं मिला”, “जनता का त्याग, लेकिन नेता का अपमान”। एक पोस्ट में लिखा गया — “छात्र जिसने सबसे ज्यादा मेहनत की, उसका नाम मेरिट लिस्ट से हटा दिया गया हो, वैसा लग रहा है।”
जेवर एयरपोर्ट: विकास की कहानी और त्याग का इतिहास
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (NIACL) द्वारा विकसित यह परियोजना 1,300 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर फैली है। पहले चरण में टर्मिनल बिल्डिंग, रनवे, एप्रन और अन्य बुनियादी ढांचा तैयार हो चुका है। यह एयरपोर्ट दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का बोझ कम करेगा और यूपी में रोजगार, पर्यटन, कारोबार को नई उड़ान देगा। अनुमान है कि पूर्ण विकसित होने पर यह सालाना 7 करोड़ यात्रियों को सेवा देगा और लाखों नौकरियां पैदा करेगा।
लेकिन इस विकास के पीछे किसानों का बड़ा त्याग है। जेवर, दादरी, बिसरख और आस-पास के गांवों से हजारों एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण की गई। 2010 के दशक में जब यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ, तब स्थानीय किसान संगठनों ने जमकर विरोध किया। मुआवजे, पुनर्वास और रोजगार की मांगों को लेकर आंदोलन हुए। धीरेंद्र सिंह, जो 2017 में भाजपा टिकट पर पहली बार जेवर से विधायक बने (और 2022 में दोबारा चुने गए), ने स्थानीय स्तर पर किसानों को समझाने, मुआवजे की प्रक्रिया में समन्वय करने और परियोजना को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बार-बार कहा कि “यह एयरपोर्ट जेवर की किस्मत बदलने वाला है”। उद्घाटन के दिन वे भावुक भी नजर आए और बोले — “मेरा सपना पूरा हुआ। अब हम दूसरे इलाकों के लोगों को भी रोजगार दे पाएंगे।”
फिर भी शिलापट्ट पर उनका नाम नहीं। शिलापट्ट पर आमतौर पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, संबंधित केंद्रीय और राज्य मंत्री, राज्यपाल और परियोजना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के नाम अंकित होते हैं। यह प्रथा औपचारिक है, लेकिन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं।
नियम, संवैधानिक प्रावधान और प्रोटोकॉल की सच्चाई
भारत के संविधान में शिलापट्ट या उद्घाटन पट्टिका पर नाम अंकित करने का कोई सीधा प्रावधान नहीं है। यह प्रशासनिक और सांस्कृतिक प्रथा है, जो केंद्र या राज्य सरकार के प्रोटोकॉल विभाग द्वारा तय की जाती है।
- संविधान के अनुच्छेद 73 और 162 के तहत कार्यपालिका की शक्तियां केंद्र और राज्य में विभाजित हैं। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे एयरपोर्ट) केंद्र-राज्य साझेदारी में चलते हैं। नामों का चयन ‘ऑर्गनाइजिंग कमिटी’ या ‘प्रोटोकॉल मैनुअल’ के आधार पर होता है। आमतौर पर शीर्ष नेता (PM, CM) और विभागीय मंत्री शामिल किए जाते हैं।
- 73वें और 74वें संशोधन (पंचायत और नगरपालिका) लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करते हैं, लेकिन ये प्रावधान बड़े राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय परियोजनाओं के उद्घाटन पट्टिकाओं पर लागू नहीं होते।
- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत नागरिक पूछ सकते हैं कि नाम चयन की प्रक्रिया क्या थी, लेकिन इसमें कोई ‘अधिकार’ नहीं है कि स्थानीय विधायक का नाम अनिवार्य हो।
- कोई अदालती फैसला या सरकारी गाइडलाइन नहीं है जो कहे कि स्थानीय विधायक का नाम शिलापट्ट पर होना चाहिए। उदाहरण के लिए, कई रेलवे स्टेशन, एक्सप्रेसवे या पावर प्लांट उद्घाटनों में भी केवल उच्च पदस्थ अधिकारियों के नाम ही होते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘श्रेय की राजनीति’ का मामला है, न कि संवैधानिक उल्लंघन। फिर भी, लोकतंत्र की भावना में चुने हुए प्रतिनिधि की अनदेखी से स्थानीय स्तर पर नाराजगी पैदा होती है। जेवर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता (लगभग 3.5 लाख) महसूस कर रहे हैं कि उनकी आवाज को नजरअंदाज किया गया।
सोशल मीडिया पर आग, राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
सोशल मीडिया (एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक) पर यह बहस तेज हो गई है। समर्थक पूछ रहे हैं — “क्या जेवर सिर्फ जमीन देने तक सीमित रह गया?” विपक्षी नेता (समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल) इसे “श्रेय चोरी” बता रहे हैं। एक आरजेडी नेता ने कहा, “7 एयरपोर्ट उद्घाटन कर दिखावा किया, लेकिन स्थानीय योगदान को भुला दिया।”
धीरेंद्र सिंह ने खुद इस पर चुप्पी साधी हुई है, लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि वे क्षेत्र के विकास के लिए लगातार लड़ते रहे। 2022 चुनाव में उन्होंने रालोद के अवतार सिंह भड़ाना को हराया था। तब भी एयरपोर्ट और फिल्म सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स को विकास का मुद्दा बनाया गया था।
आगे क्या हो सकता है? संभावनाएं और परिदृश्य
- सरकारी स्पष्टीकरण या संशोधन: सरकार प्रोटोकॉल विभाग से बयान जारी कर सकती है कि नाम चयन में कोई जानबूझकर उपेक्षा नहीं हुई। या फिर बाद में एक अलग पट्टिका लगाकर स्थानीय योगदान का उल्लेख किया जा सकता है। ऐसा पहले कई परियोजनाओं में हुआ है।
- राजनीतिक लाभ-हानि: विपक्ष 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसे मुद्दा बना सकता है। “जेवर ने सब कुछ दिया, लेकिन सम्मान नहीं मिला” — यह नारा ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। भाजपा के अंदर भी यह चर्चा हो सकती है कि स्थानीय नेताओं को ज्यादा महत्व दिया जाए।
- जनता का रुख: अगर विकास के फायदे (रोजगार, बेहतर कनेक्टिविटी, बढ़ती प्रॉपर्टी वैल्यू) जल्द दिखने लगे, तो यह विवाद धीरे-धीरे शांत हो सकता है। लेकिन अगर मुआवजे या पुनर्वास में कोई कमी रह गई, तो यह आग और भड़क सकती है।
- सोशल मीडिया का दबाव: वायरल पोस्ट्स बढ़ें तो मुख्यमंत्री कार्यालय या प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच सकता है। पहले भी कई मामलों में सोशल मीडिया ने नाम शामिल करवाए हैं।
- कानूनी/प्रशासनिक कदम: स्थानीय स्तर पर आरटीआई दाखिल की जा सकती है। कोई याचिका भी दायर हो सकती है, हालांकि अदालत इसे ‘नीतिगत मामला’ मानकर खारिज कर सकती है।
निष्कर्ष: विकास की उड़ान में समावेश की जरूरत
जेवर एयरपोर्ट न सिर्फ यूपी बल्कि पूरे एनसीआर की तस्वीर बदल देगा। यह ‘नए भारत’ का प्रतीक है — जहां सपने उड़ान भरते हैं। लेकिन विकास तभी सार्थक होता है जब उसमें हर योगदानकर्ता को सम्मान मिले। शिलापट्ट पर एक नाम गायब होना छोटी बात लगती है, लेकिन यह बड़े सवाल को जन्म देती है — क्या विकास सिर्फ तस्वीरों और ट्वीट्स तक सीमित है, या इसमें स्थानीय आवाज, स्थानीय संघर्ष और स्थानीय प्रतिनिधित्व भी शामिल है?
जेवर की धरती ने सब कुछ झेला — गुंडागर्दी से विकास तक का सफर। अब सवाल यह है कि भविष्य में ऐसी उपेक्षाएं दोहराई जाएंगी या नहीं। सरकार को चाहिए कि वह इस बहस को गंभीरता से ले और सुनिश्चित करे कि ‘विकास का मंच’ हर उस हाथ का सम्मान करे जिसने उसे संभव बनाया। जनता इंतजार कर रही है — न सिर्फ उड़ानों का, बल्कि सम्मान का भी।


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